प्रभु राम का बनवास

       

प्रभु राम का राज्याभिषेक होना था,
सज धज कर थी तैयार अयोध्या ,
इस शुभ घड़ी की बेला में ,
चहुँ ओर था उल्लास उमंग,
जन-जन में थी बड़ी कौतूहल
कब सूर्यवंश शिरोमणि सिंहासनारूढ़ होगें
किसे पता था ?नियति को था कुछ और मंजूर
अपने पुत्र मोह में मोहित कुटिल केकैयी ने
राजा दशरथ से मांगा लिया एेसा वरदान
जो थी कल्पना से परे एक कुठाराघात
भरत का हो राज्याभिषेक
राम को चौदह वर्ष का हो वनवास
यह सुन संपूर्ण अयोध्या थी शोकाकुल
पिता की आज्ञा पाकर भी
प्रभु राम क्षण मात्र के लिए बिचलित न हुए
पिता के बचन निभाने को
राजतिलक को ठुकरा कर
चल पड़े वन की ओर प्रभु
 पग पग था  कठोर संघर्ष
नहीं देखा ऐसा कोई आज्ञाकारी पुत्र
तभी तो तुम कहलाते मर्यादा पुरुषोत्तम
जीवन का आदर्श तुम्ही हो मेरे प्रभु राम !!!

                     - ©Sachin Kumar

Picture credit : Pinterest 

























 #राम      

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सूरज की पहली किरण (कविता)

ये जिंदगी (कविता)

बोधि वृक्ष(कविता)